Saturday, February 28, 2026

ईरान का भविष्य और भारत की रणनीतिक कसौटी: पश्चिम एशिया का संकट एशिया की शक्ति संतुलन को बदल देगा...?

 ईरान का भविष्य और भारत की रणनीतिक कसौटी: क्या पश्चिम एशिया का संकट एशिया की शक्ति-संतुलन को बदल देगा?

पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। बढ़ते प्रतिबंध, सैन्य तनाव और परोक्ष संघर्षों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि ईरान अस्थिर होता है या वैश्विक दबाव में कमजोर पड़ता है, तो इसका सबसे बड़ा असर किस पर पड़ेगा?

इस प्रश्न का एक स्पष्ट उत्तर है — भारत।

भारत के लिए ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार, सामरिक संतुलन और क्षेत्रीय पहुँच का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए ईरान की स्थिरता भारत के दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से सीधी जुड़ी हुई है।

1. ऊर्जा सुरक्षा: भारत की अर्थव्यवस्था की धड़कन

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। एक समय भारत, ईरान से रियायती शर्तों पर कच्चा तेल लेता था, जिसमें भुगतान व्यवस्था और परिवहन लागत भी अनुकूल थी।

लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरान से तेल आयात बंद करना पड़ा।

यदि भविष्य में ईरान में अस्थिरता बढ़ती है या व्यापक सैन्य टकराव होता है, तो खाड़ी क्षेत्र में आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसका अर्थ है:

कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल

भारत का आयात बिल बढ़ना

रुपये पर दबाव

घरेलू महंगाई में वृद्धि

ऊर्जा संकट केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है; यह राष्ट्रीय स्थिरता और विकास की गति से जुड़ा प्रश्न है।

2. चाहबार: पाकिस्तान को बाईपास करने की रणनीति

ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाहबार बंदरगाह भारत की रणनीतिक दूरदर्शिता का प्रतीक है।

यह परियोजना भारत को सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच देती है, बिना पाकिस्तान की भूमि पर निर्भर हुए।

यदि ईरान कमजोर होता है या पश्चिमी हस्तक्षेप के कारण आंतरिक उथल-पुथल बढ़ती है, तो:

भारत का निवेश जोखिम में पड़ सकता है

मध्य एशिया से सीधा संपर्क बाधित हो सकता है

चीन-पाकिस्तान आर्थिक धुरी को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है

चीन पहले ही क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। ऐसे में भारत के पास चाहबार एक संतुलन का माध्यम है। उसका कमजोर होना भारत के लिए भू-राजनीतिक झटका होगा।

3. अफगानिस्तान और पाकिस्तान: बदलता शक्ति-संतुलन

अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदले हैं।

पाकिस्तान अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। यदि ईरान कमजोर पड़ता है, तो पश्चिमी अफगानिस्तान में संतुलन बिगड़ सकता है — जहाँ ईरान का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है।

इस स्थिति में पाकिस्तान को सामरिक लाभ मिल सकता है, जिससे भारत की क्षेत्रीय भूमिका और सीमित हो सकती है।

यह भी संभव है कि वैश्विक शक्तियाँ प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बजाय अप्रत्यक्ष संतुलन रणनीति अपनाएँ। ऐसी स्थिति में भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय कूटनीति की आवश्यकता होगी।

4. इज़रायल-ईरान तनाव: भारत की संतुलन परीक्षा

भारत के रक्षा और तकनीकी संबंध इज़रायल के साथ मजबूत हैं। वहीं ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं।

यदि दोनों के बीच खुला संघर्ष होता है, तो भारत के सामने गंभीर कूटनीतिक चुनौती खड़ी होगी:

क्या भारत रक्षा सहयोग को प्राथमिकता देगा?

या ऊर्जा और कनेक्टिविटी हितों को?

भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति की असली परीक्षा इसी संतुलन में होगी।

5. यदि ईरान अस्थिर होता है: भारत के लिए संभावित परिदृश्य

(क) आर्थिक प्रभाव

तेल कीमतों में वृद्धि, आयात बिल में बढ़ोतरी, महंगाई का दबाव।

(ख) सामरिक प्रभाव

चाहबार परियोजना का अनिश्चित भविष्य, मध्य एशिया तक पहुँच में बाधा।

(ग) क्षेत्रीय शक्ति संतुलन

चीन-पाकिस्तान गठजोड़ मजबूत होना।

(घ) प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा

खाड़ी क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं। व्यापक अस्थिरता उनकी सुरक्षा और रोजगार पर असर डाल सकती है।

6. भारत के सामने रणनीतिक विकल्प

भारत को भावनात्मक प्रतिक्रिया से बचते हुए दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा:

अमेरिका के साथ सहयोग बनाए रखना

ईरान के साथ संवाद और आर्थिक परियोजनाएँ जारी रखना

ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण

क्षेत्रीय बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भूमिका

सैन्य और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना

भारत की शक्ति उसकी संतुलित विदेश नीति में रही है। न पूरी तरह पश्चिमी खेमे में, न पूरी तरह किसी वैकल्पिक धुरी में।

निष्कर्ष: भारत के लिए निर्णायक दशक

ईरान का भविष्य केवल पश्चिम एशिया का आंतरिक मामला नहीं है; यह एशिया के शक्ति-संतुलन का प्रश्न है।

यदि ईरान अस्थिर होता है, तो उसका प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक पहुँच, क्षेत्रीय प्रभाव और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा।

भारत को न तो किसी के खिलाफ खुलकर खड़ा होना है और न ही अपने हितों की अनदेखी करनी है। उसे संतुलित, व्यवहारिक और दूरदर्शी कूटनीति अपनानी होगी।

आने वाला दशक तय करेगा कि भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक निर्णायक भूमिका निभाता है या केवल परिस्थितियों का प्रतिक्रियाशील दर्शक बनकर रह जाता है।