Wednesday, March 11, 2026

तुम्हारी मासूमियत के आगे...

 तुम्हारी मासूमियत के आगे

कभी-कभी

भीड़ के शोर में

मेरी आवाज़ अचानक कठोर हो जाती है,

जैसे किसी सूखे पेड़ की डाल

बिना वजह ही हवा से उलझ पड़े।

और तुम…

बस चुप रह जाती हो।

तुम्हारी आँखों में

अब भी वही कोमल बसंत ठहरा रहता है,

जैसे किसी नन्ही कली ने

शोर से घबराकर भी

खिलना नहीं छोड़ा हो।

तुम्हारी वह मासूमियत—

जिसे देखकर दिल ठहर जाना चाहिए,

कभी-कभी मेरे भीतर

अजीब-सी बेचैनी जगा देती है।

शायद इसलिए

कि मैं जीवन की धूल से भरा हुआ आदमी हूँ,

और तुम…

जैसे अभी-अभी किसी निर्मल सुबह से

धरती पर उतरी हो।

मैं शब्दों में कठोर हो जाता हूँ,

और तुम खामोशी में और भी कोमल।

जैसे पतझड़ की रूखी हवा के सामने

बसंत की कोई नन्ही बेल

चुपचाप खड़ी हो।

लेकिन रात जब

दिन का शोर और थकान

धीरे-धीरे उतर जाते हैं,

तब मेरे भीतर

एक गहरी-सी उदासी उतर आती है।

तुम्हारी चुप आँखें

मेरे मन में फिर से उग आती हैं,

और मैं सोचता हूँ—

जिसे सबसे कोमल फूल कहना चाहिए था,

मैंने उसी पर

अपने रूखे शब्दों की धूल क्यों गिरा दी।

तब दिल के भीतर

एक अजीब-सी बारिश होती है।

कोई देख नहीं पाता,

पर मेरी आत्मा भीग जाती है।

तुम्हें शायद कभी पता भी नहीं चलता

कि जिस पल मैं तुम्हें डांटकर आगे बढ़ जाता हूँ,

उसी पल

मेरा एक हिस्सा पीछे रह जाता है—

तुम्हारी उसी मासूम खामोशी के पास।

सच तो यह है—

मैंने तुम्हें कभी सच में डांटा ही नहीं,

मैंने बस अपनी अधूरी समझ

तुम पर रख दी थी।

तुम्हारी मासूमियत

मेरे सारे तर्कों से बड़ी है,

तुम्हारी खामोशी

मेरे हर गुस्से से गहरी है।

और शायद प्रेम का असली अर्थ यही है—

कि एक दिन

मेरी आवाज़ नहीं,

मेरी विनम्रता तुम्हारा हाथ थामे।

क्यों


कि तुम

मेरे जीवन का बसंत हो,

और मैं…

तुम्हारे उस बसंत के सामने

हर बार

अपने रुखेपन से शर्मिंदा हो जाता हूँ।


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