Saturday, March 14, 2026

UPSC का भौकाल: परीक्षा, प्रतिष्ठा या भारतीय समाज की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति से लेकर भ्रष्टाचार तक...

 भारत में अगर किसी परीक्षा का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे पर सम्मान, आश्चर्य और थोड़ी-सी दहशत एक साथ दिखाई देने लगे, तो समझ लीजिए कि चर्चा UPSC Civil Services Examination की हो रही है। यह वही परीक्षा है जिसे पास करने वाले व्यक्ति को समाज अचानक एक अलग ही दर्जा दे देता है—जैसे वह कल तक साधारण नागरिक था और आज किसी उच्चतर सामाजिक प्रजाति का सदस्य बन गया हो।

यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि UPSC निकालना आसान है। इस परीक्षा में सफल होने के लिए वर्षों की तैयारी, धैर्य, मानसिक संतुलन और असाधारण अनुशासन की आवश्यकता होती है। जिसने भी यह परीक्षा पास की है, उसने निश्चित रूप से कठिन परिश्रम किया है। उस व्यक्ति और उसके परिवार को इस उपलब्धि पर गर्व करने और जश्न मनाने का पूरा अधिकार है।

लेकिन एक प्रश्न फिर भी उठता है—

क्या एक प्रतियोगी परीक्षा को पास करना इतना असाधारण है कि उसे लगभग “मिथकीय उपलब्धि” में बदल दिया जाए?

या फिर यह भौकाल वास्तव में परीक्षा की कठिनाई से अधिक हमारे समाज की मानसिक संरचना का परिणाम है?

कठिनाई का गणित और प्रतिष्ठा का मनोविज्ञान

UPSC के आँकड़े प्रभावशाली हैं। हर साल लगभग 10 से 12 लाख उम्मीदवार आवेदन करते हैं।

इनमें से लगभग 5–6 लाख उम्मीदवार प्रीलिम्स परीक्षा में बैठते हैं।

इसके बाद लगभग 10–12 हजार उम्मीदवार मुख्य परीक्षा तक पहुँचते हैं।

इंटरव्यू चरण तक पहुँचने वालों की संख्या लगभग 2000–2500 होती है।

अंततः अंतिम चयन 700–1000 उम्मीदवारों के बीच होता है।

इस प्रकार सफलता दर लगभग 0.1 प्रतिशत के आसपास रहती है।

यह आँकड़े निश्चित रूप से दर्शाते हैं कि यह परीक्षा अत्यंत प्रतिस्पर्धी है। इतनी कम सफलता दर किसी भी परीक्षा को प्रतिष्ठित बना सकती है।

लेकिन यदि केवल कठिनाई ही किसी उपलब्धि को महान बनाती, तो दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों को भी इसी प्रकार के सार्वजनिक उत्सव मिलने चाहिए थे।

उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों में चयन की प्रक्रिया कहीं अधिक कठोर होती है। बड़ी टेक कंपनियों या वैश्विक शोध संस्थानों में शीर्ष पदों के लिए चयन दर कई बार इससे भी कम होती है।

फिर भी किसी वैज्ञानिक के चयन पर पूरे शहर में जुलूस नहीं निकलते।

इससे स्पष्ट होता है कि UPSC का सामाजिक महत्व केवल कठिनाई से नहीं बल्कि उससे जुड़े प्रतीकात्मक अर्थों से भी बनता है।

पद का आकर्षण: शक्ति और प्रतिष्ठा

UPSC से निकलकर लोग प्रशासनिक सेवाओं में जाते हैं। इन सेवाओं के पास प्रशासनिक अधिकार, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक प्रभाव होता है।

एक जिला अधिकारी के निर्णय से पूरे जिले की प्रशासनिक दिशा बदल सकती है। एक पुलिस अधिकारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसलिए समाज इन पदों को केवल नौकरी के रूप में नहीं बल्कि प्रतिष्ठा और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखता है।

यहीं से उस भौकाल की शुरुआत होती है जो धीरे-धीरे उपलब्धि से बड़ा हो जाता है।

दरअसल भारतीय समाज में एक गहरी प्रवृत्ति है—हम अक्सर पद का सम्मान व्यक्ति से अधिक करते हैं।

यदि कोई व्यक्ति असाधारण शोध कर ले, कोई नई तकनीक विकसित कर दे या कोई उद्यमी हजारों लोगों को रोजगार दे दे, तो उसकी उपलब्धि की चर्चा सीमित दायरे में रह जाती है।

लेकिन एक प्रशासनिक अधिकारी बनते ही व्यक्ति समाज के एक विशेष वर्ग में प्रवेश कर जाता है।

यानी यहाँ सम्मान का केंद्र कई बार योग्यता से अधिक पद की संरचना बन जाता है।

प्रेरणादायक कहानी या सुव्यवस्थित कथा?

UPSC परिणाम आने के बाद मीडिया और कोचिंग संस्थानों की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। हर वर्ष नई-नई “प्रेरणादायक कहानियाँ” सामने आती हैं।

अखबारों और YouTube के शीर्षक कुछ इस प्रकार होते हैं—

किसान का बेटा बना IAS

रिक्शा चालक की बेटी बनी IPS

चाय बेचने वाले का बेटा बना टॉपर

इन कहानियों में प्रेरणा का तत्व अवश्य होता है और कई उदाहरण वास्तव में अत्यंत संघर्षपूर्ण होते हैं।

लेकिन धीरे-धीरे यह भी महसूस होता है कि हर सफलता को एक ही तरह की कहानी में ढाल दिया जाता है।

यहाँ एक व्यक्तिगत अनुभव उल्लेखनीय है।

यदि मैं अपनी बात करूँ तो मैं स्वयं भी एक किसान परिवार से आता हूँ। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं किसी प्रशासनिक पद पर हूँ, लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मैं एक ऐसे संतुलित किसान परिवार का बेटा हूँ जहाँ शिक्षा को महत्व दिया गया।

मैं चाहूँ तो UPSC की तैयारी कर सकता हूँ, इंजीनियरिंग कर सकता हूँ या MBA जैसे पेशेवर कोर्स कर सकता हूँ।

मेरे अपने परिचय में कई ऐसे लोग हैं जो आज प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं। उनके परिवार न तो अत्यधिक धनाढ्य थे और न ही अत्यंत गरीब।

वे अधिकतर ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति संतुलित थी—जहाँ बच्चों की शिक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध थे।

इसका अर्थ यह नहीं कि अत्यंत गरीब परिवारों से लोग सफलता प्राप्त नहीं करते। ऐसे उदाहरण निश्चित रूप से प्रेरणादायक हैं।

लेकिन उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है।

इसके बावजूद जब लगभग हर सफलता को “चरम गरीबी से चमत्कार” की कहानी बना दिया जाता है, तो कभी-कभी यह प्रेरणा से अधिक एक सुविधाजनक कथा जैसा लगने लगता है।

और यह कथा कोचिंग संस्थानों के लिए सबसे प्रभावी विज्ञापन बन जाती है।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में क्या होता है?

यदि हम अमेरिका और यूरोप के देशों को देखें, तो वहाँ भी प्रशासनिक सेवाएँ मौजूद हैं।

अमेरिका में सरकारी अधिकारी अक्सर policy professionals या civil servants कहलाते हैं।

यूरोप के कई देशों में भी सरकारी सेवाओं के लिए प्रतियोगी चयन प्रक्रिया होती है।

लेकिन वहाँ किसी व्यक्ति के सरकारी अधिकारी बनने पर सार्वजनिक उत्सव नहीं होता।

कोई शहर यह घोषणा नहीं करता कि “हमारे मोहल्ले का लड़का सरकारी अधिकारी बन गया।”

लोग इसे एक सम्मानजनक पेशा मानते हैं—लेकिन उसे सामाजिक महोत्सव में बदलने की प्रवृत्ति बहुत कम होती है।

वहाँ समाज का ध्यान अधिकतर वैज्ञानिक उपलब्धियों, उद्यमिता, नवाचार और पेशेवर दक्षता पर होता है।

सरकारी सेवा महत्वपूर्ण है, लेकिन वह सामाजिक गौरव का सबसे बड़ा प्रतीक नहीं बनती।

भारत में स्थिति अलग है क्योंकि यहाँ प्रशासनिक पदों को ऐतिहासिक रूप से एक विशिष्ट सामाजिक दर्जा प्राप्त रहा है।

सामूहिक गर्व और सामाजिक मनोविज्ञान

भारत में जब किसी गाँव से कोई UPSC निकालता है, तो लोग इसे केवल उस व्यक्ति की उपलब्धि नहीं मानते।

यह पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन जाता है।

स्वागत समारोह होते हैं, जुलूस निकलते हैं, और कई बार ऐसा वातावरण बन जाता है जैसे किसी ऐतिहासिक युद्ध में विजय प्राप्त हुई हो।

यह सामूहिक गर्व की भावना अपने आप में सुंदर भी है।

लेकिन कभी-कभी यह उत्साह इतना बढ़ जाता है कि उपलब्धि का वास्तविक स्वरूप धुंधला हो जाता है।

और तब थोड़ी-सी व्यंग्यात्मक मुस्कान स्वाभाविक हो जाती है।

क्योंकि अंततः यह एक परीक्षा ही है—कोई अंतरिक्ष अभियान नहीं।

अंतिम विचार: सम्मान बनाम महिमामंडन

UPSC निकालना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है। इसमें वर्षों का परिश्रम और मानसिक संघर्ष शामिल होता है।

लेकिन किसी भी उपलब्धि का सम्मान तभी संतुलित रहता है जब हम उसे उसकी वास्तविकता के साथ देखें।

यदि हम किसी परीक्षा को इतना ऊँचा उठा दें कि वह लगभग अलौकिक लगने लगे, तो अनजाने में हम बाकी क्षेत्रों की उपलब्धियों को छोटा कर देते हैं।

एक डॉक्टर जो रोज़ जान बचाता है, एक वैज्ञानिक जो नई खोज करता है, या एक शिक्षक जो सैकड़ों बच्चों का भविष्य बनाता है—ये सभी समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए शायद समाज के लिए सबसे संतुलित दृष्टिकोण यही है—

UPSC को सम्मान दीजिए, लेकिन उसे चमत्कार मत बनाइए।

क्योंकि अंततः महानता किसी परीक्षा से नहीं आती।

महानता उस जिम्मेदारी से आती है जिसे निभाने के लिए वह पद दिया जाता है।

UPSC या PCS जैसी परीक्षाएँ पास करना निश्चित रूप से कठिन है। लेकिन इतिहास बार-बार यह भी दिखाता है कि कठिन परीक्षा पास कर लेना और ईमानदार प्रशासक बने रहना दो अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।

प्रशासनिक सेवा में प्रवेश के समय अधिकारी संविधान के प्रति निष्ठा, निष्पक्षता और गोपनीयता की शपथ लेते हैं। लेकिन सत्ता, प्रभाव और आर्थिक प्रलोभन कभी-कभी उस आदर्श को चुनौती देने लगते हैं।

भारत में समय-समय पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार या शक्ति के दुरुपयोग के आरोप लगे।

उदाहरण के लिए:

झारखंड कैडर की IAS अधिकारी, जिनके खिलाफ मनरेगा से जुड़े धन के दुरुपयोग और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच हुई। उनके सहयोगियों के यहाँ छापों में बड़ी मात्रा में नकद बरामद होने की खबरें सामने आई थीं। Pooja Singhal को कभी देश की सबसे कम उम्र में सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाली महिलाओं में गिना गया था। उनकी इस उपलब्धि के कारण उनका नाम Limca Book of Records में भी दर्ज हुआ था।

उस समय यह कहानी प्रेरणा का प्रतीक मानी गई। एक युवा अधिकारी जिसने इतनी कम उम्र में देश की सबसे कठिन परीक्षा पास की—यह स्वाभाविक रूप से लोगों के लिए उत्साह और गर्व का विषय था।

लेकिन समय के साथ जब उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े आरोपों की जांच सामने आई, तो यह प्रश्न भी उठने लगा कि क्या केवल परीक्षा पास कर लेना ही किसी व्यक्ति को आदर्श प्रशासक बना देता है।

यह प्रश्न केवल किसी एक व्यक्ति से जुड़ा नहीं है। समय-समय पर अलग-अलग प्रशासनिक सेवाओं—जैसे


Pradeep Nirankarnath Sharma — गुजरात के पूर्व IAS अधिकारी, जिन्हें भूमि आवंटन से जुड़े भ्रष्टाचार मामलों में दोषी ठहराया गया और सज़ा भी सुनाई गई। 

B. Chandrakala — उत्तर प्रदेश कैडर की चर्चित IAS अधिकारी, जिनका नाम अवैध खनन और प्रशासनिक विवादों से जुड़ी जांचों में सामने आया था। 

Subodh Agarwal — राजस्थान में जल जीवन मिशन से जुड़े कथित घोटाले की जांच में उनका नाम सामने आया और जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की। 

M. L. Tayal — हरियाणा के भूमि आवंटन से जुड़े विवादों और आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच का सामना कर चुके हैं। 

Rajendrakumar Patel — गुजरात में जमीन उपयोग परिवर्तन से जुड़े रिश्वत और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के मामले में जांच और गिरफ्तारी की खबरें सामने आईं। 

इसी तरह अलग-अलग समय पर कुछ IPS और अन्य सेवाओं से जुड़े अधिकारियों पर भी आरोप लगे—

Sameer Wankhede — नारकोटिक्स मामलों की जांच के दौरान भ्रष्टाचार और वसूली के आरोपों को लेकर विवादों में रहे।

Sanjeev Kumar — शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच में उनका नाम एक महत्वपूर्ण अधिकारी के रूप में सामने आया।

इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं है। बल्कि यह याद दिलाना है कि प्रशासनिक पद केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं बल्कि जिम्मेदारी का भार भी है।

कई अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने ईमानदारी से काम किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई। उदाहरण के लिए Raju Narayana Swamy जैसे अधिकारी अपने सख्त प्रशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ रुख के लिए जाने जाते हैं। 

इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक सेवा में दो प्रकार की कहानियाँ साथ-साथ चलती हैं—

एक तरफ आदर्श और ईमानदारी की कहानियाँ, और दूसरी तरफ शक्ति के दुरुपयोग की चेतावनी देने वाले उदाहरण।

असली परीक्षा

यहीं वह बिंदु है जहाँ मूल प्रश्न सामने आता है।

UPSC या PCS की परीक्षा पास करना निश्चित रूप से कठिन है।

लेकिन उससे भी कठिन है उस पद की गरिमा को बनाए रखना।

क्योंकि परीक्षा में सफल होने के लिए केवल ज्ञान की आवश्यकता होती है।

लेकिन प्रशासनिक सेवा में सफल होने के लिए चरित्र, नैतिकता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता होती है।

कई अनुभवी प्रशासक अक्सर कहते हैं—

“Civil services exam tests your knowledge for a few days,

but public service tests your character for an entire lifetime.” हालांकि ऐसी बातें एक समय और उस हद तक पहुंचने के बाद टुच्चा प्रतीत होने लगता है।

और शायद यही वह सच्चाई है जिसे समझना सबसे अधिक आवश्यक है।

क्योंकि अंततः किसी अधिकारी की महानता उसके रैंक से नहीं बल्कि उसके निर्णयों और उसके चरित्र से तय होती है।

No comments:

Post a Comment