प्रेम कोई पूर्ण खिला हुआ फूल नहीं,
वो तो अक्सर अधूरी, भीगी हुई एक पंखुड़ी होता है,
जिसमें खुशबू भी होती है और चुपचाप गिर जाने का साहस भी।
प्रेम स्वार्थ से नहीं, भीतर की शुद्धता से जन्म लेता है,
जहाँ पाने की नहीं, बस होने की चाह रह जाती है।
वो किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं रहता,
धीरे-धीरे पूरी कायनात से रिश्ता जोड़ लेता है।
जब प्रेम होता है,
तो मन हल्का नहीं, गहरा हो जाता है
हर दर्द को समझने लगता है,
हर खामोशी को सुनने लगता है।
प्रेम में आदर खुद-ब-खुद उतर आता है,
जैसे नदी अपने किनारों को छूकर भी लांघती नहीं,
वैसे ही सच्चा प्रेम सीमाएँ जानता है।
कभी-कभी प्रेम मिलन नहीं,
बस एक अधूरी कहानी बनकर रह जाता है,
पर वही अधूरापन उसे सबसे सच्चा बना देता है।
प्रेम में होना,
दरअसल खुद से मिलना है
अपने भीतर की धूल को धोकर,
एक निर्मल आईने जैसा हो जाना है।
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