Thursday, September 3, 2020

उम्र अभी गुज़री नही, तजुर्बों ने आशियाने बनाने लगे हैं।

 उम्र अभी गुज़री नही, 

तजुर्बों ने आशियाने बनाने लगे हैं।


वो संकरी पगडंडियों वाली कच्ची सड़क,

जो घर से होते हुए, पर्वत को जाती थी,

जो घर की रौशनदान जिसकी चोटी को झाँकते थे।


सुनसान जगहों पर मौजूद,

वो बरगद, इमली, बैर के पेडों का

वो डरावनी कहानियों का क़हर,

जो अक्सर रात को, मेरी आँखों मे आके अपना घर बनाया करती थी।

और वो माँ का "आँचल" जिसमे छिपाकर

माँ अक्सर कहा करती थीं, मत जाया करो वहाँ।


वो सारी डरावनी कहानियों का जगह,

अब मुझे आकर्षित करते है।

शायद उसकी भी गुज़रती उम्र की अंतिम दहलीज़ में, 

मेरी बचपना अभी भी मौजूद होगी।


तजुर्बों के जवां होते शहर में,

यादों की बुजुर्ग होने की जगह कम पड़ रही है।



Monday, August 31, 2020

तुम्हें... फिर लिखूँगा

 तुम कहो तो मैं तुम्हे फिर लिखूँगा,

माफ़ करदो, ग़लती हो गई,

एक मौका तो दो, 

तुम जैसे कहोगी, वैसे लिखूँगा।

बहुत क़रीने से लिखूँगा, इस बार, 

यकीन करो, ठीक, तुम्हारी कमरे में रखें, 

किताबों की तरह।

पिछली बार जब मैं तुम्हें लिखने आया था,

तब तुम्हें कोई और लिख रहा था।

पर जाने दो भी, क्या रखा है?

उन पुरानी बातों में।

लेकिन तुम बिल्कुल फ़िक्र ना करो,

मैं तुम्हें उस तरह नही लिखूँगा,

जिस तरह, उसने तुम्हें लिखा था।

और तुम ये भी फ़िक्र ना करो,

की मैं उसकी तरह, तुम्हें छूकर लिखूँगा,

लेकिन हां, कुछ फ़ासलों की दूरी,

पर बैठ तुम्हें पूरा लिखूंगा, 

छूकर नही बल्कि स्पर्श कर।

उसने तुम्हें लिख़ने में सैकड़ों,

पन्ने गवाँ दिए, 

आख़िरकार उसने तुम्हे गवाँ दिया।

चलो, शुरू करता हूँ, तुम्हें लिखना,

उस फुलवारी की काठ की बेंच पर तुम बैठना

और मैं कुछ फासलों की दूरी पर।

अरे ये क्या! 

तुम्हारे मोती से आँशु क्यों लुढ़क रहे है?

मैं बोल रहा हूँ न कि तुम्हें लिख रहा हूँ।

माफ़ करना वो दिसंबर वाली रात को,

मैं फिर तुम्हें लिखना चाहता हूँ,

की तुमनें कहा था, 

क्या तुम फ़ालतू में लिखते रहते हो।

चुप रहो, 

तुम मुझे लिख रहे हो या ताना दे रहे हो।

उसने कहा और हँस दिया।

चलो दिखाओ, 

क्या लिखा तुमने अभीतक,

फ़िर, उसने कहा।

लो, लिख दिया मैंने शब्दों का "माला",

हो सके तो यह "माला" मुझे पहना दो।

मैंने कहा!

Saturday, December 21, 2019

काश मुद्दा होता।।

काश, मुद्दा लड़ने के बजाए,
पढ़ने का होता!

काश मुद्दा, बटने के बजाए,
एक साथ होने का होता!

काश मुद्दा, रोने के बजाए,
हँसने और हँसाने का होता!

काश मुद्दा, मंदिर-मस्ज़िद,
के बजाए, इंसानियत में डूबने का होता!

काश मुद्दा, हिन्दू-मुसलमान होने के बजाए,
होना ही नही होता!

काश मुद्दा, हैवानियत के बजाए,
इंसानियत का होता!

काश मुद्दा, पेड़ काटने के बजाए,
पौधें लगाने का होता!


तुम्हारी याद में

सबकुछ है, लेकिन एक ख़ुशनुमा तन्हाई भी है,
जो मुझमें कहीं, वीरानो सी, पतझड़ सी बगीचो में,
मेरे बदन को सेकती, तुम्हारी शुष्क यादें,
जिसमें, तुम्हारे साथ के दिनों कि,
नई-पुरानी बातें, जो अनकहीं और अनसुनी
रह गई, दो बदन की अधुरी किस्से,
जैसे कलम और स्याही के शब्दों का सफ़र,
मैं डूब जाता हूँ तुम्हारी यादों की कस्ती में,
तन्हाई का सफर कर रहा हूँ, तुम्हारे जाने के बाद।।


Friday, July 26, 2019

चलो देखते है, तुम्हारे हुस्न के कचहरी में हाज़िरी लगाकर, क्या चासनी गिला है या फिर अरब की सूखी ज़मीन।

Saturday, July 21, 2018

बहुत रोता है, दिल!!

बहुत रोता है, दिल!!

जब अपने इश्क़ की यादों,
की हुस्न पर, तारीख़ जब पड़ी,
तबादला हुआ, ज़माने बदले,
लेकिन इमारतें, उदास ईंटो का ही रहा,

बहुत रोता है, दिल!!

जब अपनी उदास इश्क़ की,
यादों की क़िताब खोलता हूँ,
पन्नें पलटता हूँ, शब्द रोते है,
जब दिल दर्द सी गरजती है,
दिल रोता है, आँखें बरसती हैं,

बहुत रोता है दिल!!

आँशु ग़म की पुतलियों से झांकते है,
ग़म की स्याहियों से बने शब्द,
चुप बैठे वर्षो से पन्नों पर,
अपने आशुओ से भीगाती,
रोती, चीख़ती, यादों को सहेज़ती

बहुत रोता है, दिल!!

जब अपनी उदास इश्क़ की,
यादों की क़िताब खोलता हूँ,
पन्नें पलटता हूँ, शब्द रोते है,


Friday, June 8, 2018

।।साम्राज्यवाद और पूँजीवाद में फंसा, देश का लोकतंत्र और बीच मे पिसती आम जनता।।

आज देश मे चारो तरफ अगर गौर किया जाए, तो आप देखेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत मे, आज के परिवेश में लोकतंत्र के मंदिर में बैठे परेशान राजनीतिज्ञ ओछी राजनीति करने से बाज़ नही आ रहे है, कभी  भड़काऊ बयानबाज़ी तो कभी उज़ूल फिज़ूल की जुमलेबाज़ी जिससे राजनीति से लोगो का विश्वास ही नही बल्कि आम जनता की नजर में उनकी एक निम्न स्तरीय और अव्वल दर्जे का स्वार्थी राजनीतिज्ञ की छवि भी बन रही है | ऐसे में इनके बीच पिसती और घसीटती आम जनता और एक तरफ मुनाफ़े के दौर को देखे तो पूँजीवाद को शाश्वत रूप बड़े उद्योगपतियो को फायदा पहुँच रहा है, राजनीतिवाद और पूँजीवाद इन दो पहलुओं के सांठ-गांठ को व्यक्ति विषेश को ना समझकर आम जनता को समझने कि ज़रूरत है।
ये आम जनता कोई नौकरशाहों और अफसरशाहों से तात्पर्य नही बल्कि ग़रीब, मज़दूर जो फैक्टरियों में, जो कम  मज़दूरी पर काम कर रहे है, किसान, जो आज आत्महत्या करने को मज़बूर हो रहे है, ग़रीब आदिवासि जो आज भी आधुनिक समाज़ से वंचित दूर जंगलो में रहने और नक्सल गतिविधियों में शामिल रहने को मजबूर हैं, ऐसे में विद्यार्थियों को भी समझने की ज़रूरत है और हिन्दू मुस्लिम के राजनीति करने वालो के झूठे नुमाइंदों से बचने की ज़रूरत है।
अगर हम गौर करे तो ज़ाने अनजाने में देश की राजनीती एक बहुत बड़े तबके, पूंजीवाद में फसी हुई है ऐसे में यहाँ लोकतंत्र में बैठी सरकार को पूँजीवाद की लाल रंग की मानसिकता को समझने की ज़रूरत है, वही आम जनता को भी राजनीतिग्यो के साम्राज्यवादी विचारधारा को भी समझने की ज़रूरत है। क्योंकि यहाँ पर आम जनता को साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के अदृश्य वाली नकारात्मक उदेश्य को समझना ही होगा।
मज़दूर जो हमारे ही समाज़ का एक अभिन्न अंग है, जिसे साम्राज्यवाद और पूंजीवाद वर्षों से भेदभाव करता आ रहा है। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।  ऐसे में घटिया असमानता और ज़बरदस्ती थोपा गया भेदभाव भारत को एक बहुत बड़ी खाई में धकेलने को मजबूर हो रहा है। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद एक तरफ अपने हुकूमत के छत पर बैठ कर अययाशी कर रहा है और एक तरफ देश की मासूम जनता इनके बीच पीस रही है।
ऐसे में हमको और आपको, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की अभद्र विचारधारा को समझना समझना ही होगा, वरना वो दिन दूर नही जब अरब और नॉर्थ कोरिया जैसे देशो में हमारे देश की गिनती होने लगेगी।