Thursday, October 15, 2020

तुम दो या तीन होती, फिर भी मैं तुम्हें ही चुनता।

 यह मेरे लिए कहना मुश्किल है, कि 

तुम मेरे लिए कितनी अहम हो, 

शायद निशब्दता शब्द भी मेरे लिए कम पड़ जाए। 

क्योंकि तुमने मुझे जिस तरह जीना सिखाया है, 

वह एक ख़ुशनुमा तरीका ना होकर, 

मेरे लिए दुनिया मे सबसे,

अद्भुत और अलग एहसास है। 

मैं अपने आत्मा की गहराई से कह सकता हूँ, कि 

यदि तुम दो या तीन होती फ़िर भी मैं तुम्हें ही चुनता। 

मैं तो चाहता हूँ कि आज का दिन हम दोनों के फासलों के बीच गवाह बनी ये रात, 

यही और हमेशा के लिए ठहर जाएं,

लेकिन आज का दिन रुकेगा नही।

लेकिन हम दोनों आज भी है,कल भी 

और परसो भी क्योकि, 

आज - कल परसो आज ही बना रहेगा। 

क्योंकि तुम सिर्फ आज नही हो बल्कि,

हर सुबह दोपहर और शाम तीनो पहर, तुम ही तुम हो।


Thursday, September 3, 2020

यादें संस्कारों की...

मेरे बड़े चाचा और छोटे चाचा ने घर बनाया है।

वही ईंट और कंक्रीट वाली" मज़बूत दीवारों वाली।

जिसमे यादों ने अपने दम घोंट लिए है।


लेकिन वो घर याद आता है।


मेरे पापा भी घर बनाने वाले है।

वही, ईंट और कंक्रीट वाली। मज़बूत दीवारों वाली।

जो एक दिन आधी अधूरी यादें भी कहीं दफ़्न हो जाएंगे।


लेकिन वो घर याद आता है।


लेकिन, मुझे बेहद भाने लगा है,

मेरे पापा की हिस्से वाली पुराना घर।

इसके दीवारों पर लगी "चुने" वाली रंग,

बारिश की बूंदों से भीगकर, 

अब टूटती फीके रंग वाली बची खुची यादों पपड़ियाँ,

घर की दीवारों में उगी, 

वो दादी की झुर्रियों जैसी, 

मनोर्मम बसंत सी मुस्कुराती यादों की दरारें।


लेकिन वो घर याद आता है।


और वो पहले वाली घर, 

जिसपर छोटे चाचा ने घर बनाया है।

वही, ईंट और कंक्रीट वाली, मज़बूत दीवारों वाली।

जिसमे दो दो अमरूद के पेड़ हुआ करते थे।

उसमें, कभी नयी हरि हरि पत्तियां,

तो कभी पतझड़ वाली पत्तियां,

फिर, उन पत्तियों को ख़ामख़ा बिनती मेरी बूढ़ी दादी।

और वो खपरैल वाले कमरे और इन सबको अपनी ओर आकर्षित करता वो यादों का गहरा कुआँ,

जिसमे पानी ना होकर, सालों यादों की नमी रहा करती थी।

जिसमें पुराने दिनों की यादों की खूबसूरत सिलवटें थी।


लेकिन वो घर याद आता है।


बहुत दिनों के बाद घर आया हूँ।

लेकिन अब वो झलकियां नही मिलती बूढ़ी अम्मा के,

पाँव, पापा की हिस्से वाली पुरानी दीवारों वाली चौखट से गुजरने को नागवार गुज़रती है।

अब टहलता रहता हूँ। 

अपने यादों की काई लगी छत पे।

उम्र अभी गुज़री नही, तजुर्बों ने आशियाने बनाने लगे हैं।

 उम्र अभी गुज़री नही, 

तजुर्बों ने आशियाने बनाने लगे हैं।


वो संकरी पगडंडियों वाली कच्ची सड़क,

जो घर से होते हुए, पर्वत को जाती थी,

जो घर की रौशनदान जिसकी चोटी को झाँकते थे।


सुनसान जगहों पर मौजूद,

वो बरगद, इमली, बैर के पेडों का

वो डरावनी कहानियों का क़हर,

जो अक्सर रात को, मेरी आँखों मे आके अपना घर बनाया करती थी।

और वो माँ का "आँचल" जिसमे छिपाकर

माँ अक्सर कहा करती थीं, मत जाया करो वहाँ।


वो सारी डरावनी कहानियों का जगह,

अब मुझे आकर्षित करते है।

शायद उसकी भी गुज़रती उम्र की अंतिम दहलीज़ में, 

मेरी बचपना अभी भी मौजूद होगी।


तजुर्बों के जवां होते शहर में,

यादों की बुजुर्ग होने की जगह कम पड़ रही है।



Monday, August 31, 2020

तुम्हें... फिर लिखूँगा

 तुम कहो तो मैं तुम्हे फिर लिखूँगा,

माफ़ करदो, ग़लती हो गई,

एक मौका तो दो, 

तुम जैसे कहोगी, वैसे लिखूँगा।

बहुत क़रीने से लिखूँगा, इस बार, 

यकीन करो, ठीक, तुम्हारी कमरे में रखें, 

किताबों की तरह।

पिछली बार जब मैं तुम्हें लिखने आया था,

तब तुम्हें कोई और लिख रहा था।

पर जाने दो भी, क्या रखा है?

उन पुरानी बातों में।

लेकिन तुम बिल्कुल फ़िक्र ना करो,

मैं तुम्हें उस तरह नही लिखूँगा,

जिस तरह, उसने तुम्हें लिखा था।

और तुम ये भी फ़िक्र ना करो,

की मैं उसकी तरह, तुम्हें छूकर लिखूँगा,

लेकिन हां, कुछ फ़ासलों की दूरी,

पर बैठ तुम्हें पूरा लिखूंगा, 

छूकर नही बल्कि स्पर्श कर।

उसने तुम्हें लिख़ने में सैकड़ों,

पन्ने गवाँ दिए, 

आख़िरकार उसने तुम्हे गवाँ दिया।

चलो, शुरू करता हूँ, तुम्हें लिखना,

उस फुलवारी की काठ की बेंच पर तुम बैठना

और मैं कुछ फासलों की दूरी पर।

अरे ये क्या! 

तुम्हारे मोती से आँशु क्यों लुढ़क रहे है?

मैं बोल रहा हूँ न कि तुम्हें लिख रहा हूँ।

माफ़ करना वो दिसंबर वाली रात को,

मैं फिर तुम्हें लिखना चाहता हूँ,

की तुमनें कहा था, 

क्या तुम फ़ालतू में लिखते रहते हो।

चुप रहो, 

तुम मुझे लिख रहे हो या ताना दे रहे हो।

उसने कहा और हँस दिया।

चलो दिखाओ, 

क्या लिखा तुमने अभीतक,

फ़िर, उसने कहा।

लो, लिख दिया मैंने शब्दों का "माला",

हो सके तो यह "माला" मुझे पहना दो।

मैंने कहा!

Saturday, December 21, 2019

काश मुद्दा होता।।

काश, मुद्दा लड़ने के बजाए,
पढ़ने का होता!

काश मुद्दा, बटने के बजाए,
एक साथ होने का होता!

काश मुद्दा, रोने के बजाए,
हँसने और हँसाने का होता!

काश मुद्दा, मंदिर-मस्ज़िद,
के बजाए, इंसानियत में डूबने का होता!

काश मुद्दा, हिन्दू-मुसलमान होने के बजाए,
होना ही नही होता!

काश मुद्दा, हैवानियत के बजाए,
इंसानियत का होता!

काश मुद्दा, पेड़ काटने के बजाए,
पौधें लगाने का होता!


तुम्हारी याद में

सबकुछ है, लेकिन एक ख़ुशनुमा तन्हाई भी है,
जो मुझमें कहीं, वीरानो सी, पतझड़ सी बगीचो में,
मेरे बदन को सेकती, तुम्हारी शुष्क यादें,
जिसमें, तुम्हारे साथ के दिनों कि,
नई-पुरानी बातें, जो अनकहीं और अनसुनी
रह गई, दो बदन की अधुरी किस्से,
जैसे कलम और स्याही के शब्दों का सफ़र,
मैं डूब जाता हूँ तुम्हारी यादों की कस्ती में,
तन्हाई का सफर कर रहा हूँ, तुम्हारे जाने के बाद।।


Friday, July 26, 2019

चलो देखते है, तुम्हारे हुस्न के कचहरी में हाज़िरी लगाकर, क्या चासनी गिला है या फिर अरब की सूखी ज़मीन।